Wednesday, 10 February 2016

बद्रीनाथ धाम से जुड़ी 7 अनोखी बातें

हिंदू धर्म के प्रसिद्ध चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु का निवास स्थल माना जाता है। यह भारत के उत्तरांचल राज्य में अलकनंदा नदी के तट पर नर-नारायण नामक दो पर्वतों के बीच बसा है। बद्रीनाथ धाम से कई धार्मिक और पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इस जगह को और भी खास बनाती हैं।
जानें बद्रीनाथ धाम से जुड़ी 7 अनोखी बातें...

यहीं लिखी थीं वेदव्यास ने महाभारत

मान्यताओं है कि, बद्रीनाथ ही वो जगह है, जहां वेदव्यास ने हिंदू धर्म के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण ग्रंथ यानी महाभारत की रचना की थी। बद्रीनाथ क्षेत्र में एक गुफा है, जिसे महाभारत की रचनास्थल माना जाता है।
 भगवान विष्णु की तपस्या स्थली
पुराणों के अनुसार, बद्रीनाथ धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी। इस जगह को भगवान विष्णु की तपोभूमि माना जाता है। भगवान विष्णु ने कई सालों तक इस जगह पर तपस्या की और वे ही यहां के पालनहार हैं।
 कैसे पड़ा इस जगह का नाम बद्रीनाथ
कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस जगह पर कठोर तपस्या की, जब देवी लक्ष्मी ने बदरी यानी बेर का पेड़ बन कर सालों तक भगवान विष्णु को छाया दीं और उन्हें बर्फ आदि से बचाया। देवी लक्ष्मी के इसी सर्मपण से खुश होकर भगवान विष्णु ने इस जगह को बद्रीनाथ नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया।
 

शकंराचार्य को मिली थीं यहां की मूर्ति

मान्यताओं के अनुसार, यहां स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति सबसे पहले आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य को यहां के एक कुंड में मिली थी। जिसे उन्होंने एक गुफा में स्थापित कर दिया था। बाद में राजाओं द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण करवा कर मूर्ति को इस मंदिर में स्थापित किया गया।
 

ऐसा है यहां की विष्णु मूर्ति का स्वरूप

बद्रीनाथ धाम के गर्भगृह में भगवान विष्णु की चतुर्भुज मूर्ति स्थापित है, जो कि शालिग्राम शिला से बनी है। यहां की मूर्ति बहुत ही छोटी है, जिसे हीरों के जड़ा हुआ मुकुट पहनाया जाता है। यहां पर भगवान विष्णु के साथ भगवान कुबेर और उद्धव जी की भी मूर्तियां स्थापित हैं।
 

हर समय गर्म रहता है यहां के कुंड का पानी

अलकनंदा नदी के किनारे तप्त नामक एक कुंड है। इस कुंड का पानी हर समय गर्म ही रहता है, जो की किसी चमत्कार के कम नहीं। यह कुंड चमत्कारी होने के साथ-साथ बहुत पवित्र भी माना जाता है। इस कुंड में स्नान करने पर भक्त पापों से मुक्ति पाते हैं। 
 

यहां बहती है गंगा के बारह स्वरूपों में से एक अलकनंदा

कहा जाता है कि जब गंगा का धरती पर अवतरण हुआ, तब धरती गंगा का वेग सहने में असमर्थ थीं, इसलिए गंगा ने अपने आप को बारह भागों में बांट कर अलग-अलग जगहें बहने लगीं। अलकनंदा नदी गंगा के उन्हीं बारह भागों में से एक है। इसी के किनारे बद्रीनाथ धाम बसा हुआ है।

13वीं शताब्दी का माना जाता है ये मंदिर जहां देवी जी रोज शराब पीती हैं।

राजस्थान में (नागौर जिले के रिया तहसील में ) ऐसा ही एक मंदिर है जहां देवी जी रोज शराब पीती हैं। हर भक्त उन्हें शराब का प्रसाद चढ़ाता है। हालांकि मान्यता है कि यहां यदि कोई ऐसा व्यक्ति शराब चढ़ता है जिसकी नीयत ठीक नहीं होती तो देवी उसका प्रसाद ग्रहण नहीं करती। 

कहते हैं यदि मन्नत के हिसाब से प्रसाद हो तो काली सहज ही स्वीकार कर लेती हैं, लेकिन यदि प्रसाद की मात्रा वादे से कम या ज्यादा हो तो वे उसे अस्वीकार कर देती हैं। शराब से भरा चंदी का प्याला देवी के सामने करके पुजारी आंखे बंद कर उनसे प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह करता है। कुछ ही क्षणों में प्याले से शराब गायब हो जाती है। ऐसा तीन बाद किया जाता है। ताीसरी बार प्याला आधा भरा रह जाता है। कहते हैं माता ढाई प्याला शराब ही ग्रहण करती हैं।
वैज्ञानिक भी हैं हैरान :
काली माता के इस मंदिर को भवाल माता के मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां इनके दो स्वरूप हैं, काली और ब्राह्मणी। काली की मूर्ति के नीचे दो दीपक जलते रहते हैं। जब मांगी गई मन्नत के हिसाब से मदिरा चढ़ाई जाती है तो उसकी एक बूंद भी नीचे गिरे बिना मदिरा प्याले से गायब हो जाती है। वैज्ञानिक भी इस बात का पता नहीं लगा पाए हैं और अब इसे काली माता का चमत्कार मानने लगे हैं।
 
नीयत ठीक न हो तो प्रसाद ग्रहण नहीं करती मां :
प्रसाद ग्रहण करने को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। कहते हैं यदि कोई यह देखने के लिए कि वाकई में काली की प्रतिमा शराब पीती हैं, शराब चढ़ाता है तो उसे काली ग्रहण नहीं करती हैं। इसके अलावा उनके प्रसाद भी ग्रहण नहीं करती हैं जो चरित्र से भ्रष्ट होते हैं। 
 
डाकुओं ने बनवाया था ये मंदिर
कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले डाकुओं का एक झुंड लूट का माल लेकर आया। वे एक चबूतरे पर लूट का माल बांटने लगे। इसी बीच चबूतरे पर बनीं मूर्तियों का चमत्कार डाकुओं को दिखा। वे दंग रह गए और उन्होंने लूट के माल से मंदिर का निर्माण करवाया।
डाकुओं ने बनवाया था ये मंदिर
कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले डाकुओं का एक झुंड लूट का माल लेकर आया। वे एक चबूतरे पर लूट का माल बांटने लगे। इसी बीच चबूतरे पर बनीं मूर्तियों का चमत्कार डाकुओं को दिखा। वे दंग रह गए और उन्होंने लूट के माल से मंदिर का निर्माण करवाया।
13वीं शताब्दी का माना जाता है ये मंदिर
जिला मुख्यालय नागौर से करीब 105 किमी की दूरी पर रियां तहसील में भवाल गांव हैं। इस गांव का नाम यहां 13वीं सदी में बने इस काली मां के मंदिर के नाम पर पड़ा है। यहां एक प्राचीन शिलालेख है जो 12वीं शताब्दी का बताया जाता है। यह मंदिर लाल पत्थरों से निर्मित है। विशाल पोल में प्रवेश करते ही छोटे से चौक को पार करना पड़ता है। मंदिर की दीवारों पर प्राचीन काल की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इसमें यक्ष, गंधर्व, किन्नर और देवी-देवताओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इस मंदिर की गिनती राजस्थान के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में होती है। यहां नवरात्रि में मेला भी लगता है।
जिला मुख्यालय नागौर से करीब 105 किमी की दूरी पर रियां तहसील में भवाल गांव हैं। इस गांव का नाम यहां 13वीं सदी में बने इस काली मां के मंदिर के नाम पर पड़ा है। यहां एक प्राचीन शिलालेख है जो 12वीं शताब्दी का बताया जाता है। यह मंदिर लाल पत्थरों से निर्मित है। विशाल पोल में प्रवेश करते ही छोटे से चौक को पार करना पड़ता है। मंदिर की दीवारों पर प्राचीन काल की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इसमें यक्ष, गंधर्व, किन्नर और देवी-देवताओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इस मंदिर की गिनती राजस्थान के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में होती है। यहां नवरात्रि में मेला भी लगता है।