Saturday, 16 April 2016

ब्रह्मणी माता का प्राचीन मंदिर

कोटा से सटे बारां जिला मुख्यालय से 28 किमी दूर सोरसन में ब्रह्मणी माता का प्राचीन मंदिर है। ब्रह्मणी माता प्रतिमा की पीठ (पृष्ठ भाग) की पूजा होती है। यहां ब्रह्मणी माता का प्राकट्य करीब 700 वर्ष पहले हुआ बताया जाता है। तब यह देवी सोरसन के खोखर गौड़ ब्राह्मण पर प्रसन्न हुई थी। तब से खोखरजी के वंशजों को ही निज मंदिर में पूजा करते हैं। गुजराती परिवार करता है सप्तशती का पाठ .......
- परंपराओं में एक गुजराती परिवार के सदस्यों को सप्तशती का पाठ करने, मीणों के राव भाट परिवार के सदस्यों को नगाड़े बजाने का अधिकार मिला हुआ है। मंदिर चारों तरफ परकोटे से घिरा हुआ है।
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इसे गुफा मंदिर भी कहा जा सकता है। मंदिर के तीन प्रवेश द्वारों में से दो द्वार कलात्मक हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पूर्वाभिमुख है। परिसर के मध्य स्थित देवी मंदिर में गुम्बद द्वार मंडप और शिखरयुक्त गर्भगृह है।  गर्भगृह के प्रवेश द्वार की चौखट 5 गुणा 7 के आकार की है, लेकिन प्रवेश मार्ग 3 गुणा ढ़ाई फीट का ही है। इसमें झुककर ही प्रवेश किया जा सकता है। पुजारी झुककर पूजा करते हैं। मंदिर के गर्भगृह में विशाल चट्टान है। चट्टान में बनी चरण चौकी पर ब्रह्माणी माता की पाषाण प्रतिमा विराजमान है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि अग्रभाग की पूजा ना होकर पृष्ठ भाग (पीठ) की पूजा-अर्चना होती है। दुनिया का पहला मंदिर है, जहां देवी विग्रह के पृष्ठ भाग को पूजा जाता है। स्थानीय लोग इसे पीठ पूजाना कहते हैं। देवी प्रतिमा की पीठ पर प्रतिदिन सिंदूर लगाया जाता है और कनेर के पत्तों से श्रृंगार किया जाता है। देवी को नियमित रूप से दाल-बाटी का भोग लगाया जाता है। देवी नंदवाना बोहरा परिवार की आराध्य देवी हैं, जिसमें मानाजी बोहरा का जन्म हुआ था। 
चार सौ साल से जल रही है अखंड ज्योति
- मंदिर का निर्माण नंदवाना बोहरा परिवार के मानाजी बोहरा ने विक्रम संवत 1624 से 1640 के मध्य करवाया था। मंदिर का डोरा (शुभारंभ) अगहन बुदी चौदस संवत 1641 में हुआ था। मंदिर में पिछले चार सौ सालों से अखंड ज्योति जल रही है। ब्रह्माणी माता मंदिर में विक्रम संवत 1624 की कार्तिक बुदी एकादशी से देशी घी के अखंड दीप प्रज्जवलित हैं। रिसायतकाल में अखंड ज्योति की रक्षा के लिए पांच सिपाहियों की गार्ड मंदिर में तैनात रहती थी, लेकिन 1948 से गार्ड हटा ली गई। तब से पंचायत का चौकीदार यह जिम्मेदारी निभाता है।
क्यों पूजी जाती है पीठ
- पुजारी बद्रीलाल शर्मा ने बताया कि प्रचलित किवदंती में कहा जाता है कि एक बार मानाजी बोहरा खेत में हल जोत रहे थे। उनकी पत्नी दोपहर का भोजन लेकर खेत पर रही थी। रास्ते में ठोकर लगने से भोजन जमीन पर गिर गया। उन्होंने जैसे ही भोजन के पात्रों को समेटना प्रारंभ किया, देखा कि लोहे का पात्र सोने में बदल गया। उन्होंने खेत पर पहुंचकर पति को बात बताई। तब मानाजी उस स्थान पर आए, जहां उनकी पत्नी को ठोकर लगी थी। तभी उन्हें एक पारस पत्थर दिखाई दिया, जिसे पति-पत्नी घर ले आए। रात्रि के समय ब्रह्माणी माता ने मानाजी के स्वप्न में आकर कहा कि माना मैं तुम पर प्रसन्न हूं। वह पारस पत्थर मेरा ही रूप है, लेकिन मैं तब तक तुम पर मेहरबान रहूंगी, जब तक तुम्हारे घर में किसी के मुंह से किसी बात के लिए ना नहीं होगी। बोहराजी ने जीवन में अनेक जनकल्याण के कार्य करवाए। तब सोरसन और मानपुरा गांव के तालाबों को एक करने की योजना चल रही थी। तभी उनकी पुत्रवधू के मुंह से ऐसे शब्द निकल गए, जिनके कारण देवी नाखुश हो गई। बस उसी रात को ब्रह्माणी माता ने मानाजी से पुन: स्वप्न में आकर अपने जाने की चर्चा की। मानाजी ने बहुत अनुनय विनय की और कहा कि देवी मां जब तक मैं बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा करके नहीं लौटूं, तब तक आप यहीं विराजें। जिस समय मानाजी और ब्रह्माणी माता में वार्तालाप हो रहा था उस समय देवी मानाजी की तरफ से पीठ करके खड़ी थीं। मानाजी तीर्थ यात्रा चले गए और फिर कभी नहीं लौटे, तभी से यहां देवी की पीठ पूजी जाती है। मंदिर में दर्शन करने वाले इस तथ्य को समझ नहीं पाते हैं, जब तक कि कोई उन्हें नहीं बताए क्योंकि पृष्ठ भाग का श्रृंगार मुख भाग पर होने वाले श्रृंगार के जैसा होता है।





महाशिवरात्रि पर लगता है मेला
- पुजारी शर्मा ने बताया कि नवरात्र और महाशिवरात्रि के दौरान देवी की सांयकालीन आरती 24 बत्तियों से की जाती है। महाशिवरात्रि पर 20 दिवसीय मेले का आयोजन होता है। ब्रह्माणी माता मंदिर सात्विक प्रवृत्ति का है। यहां नारियल फोड़ना भी वर्जित है। पान, सुपारी साबुत ही चढ़ाए जाते हैं। जिन्न भूत-प्रेत बाधाओं से पीड़ित व्यक्ति उनसे मुक्ति के लिए यहां लाए जाते हैं, जो बिना भाव आए ही प्रेत बाधाओं से मुक्त होकर यहां से घर पहुंचते हैं।