Saturday, 5 March 2016

प्राचीन शिव मंदिर

रायसेन शहर में किले की पहाड़ी पर बना प्राचीन शिव मंदिर। सुबह उगते सूर्य की किरणें जैसे ही इस मंदिर पर पड़ती हैं तो पूरा मंदिर सोने के जैसी सुनहरी रोशनी से भर उठता है। हजारों साल पुराना यह मंदिर पत्थर का बना हुआ है। इस पर किसी तरह का रंगरोगन नहीं किया गया है। सोने से चमकते मंदिर का यह दृश्य देखते ही बनता है।




साल में एक बार खुलते हैं सोमेश्वर धाम के पट
- रायसेन किले की पहाड़ी पर भगवान भोलेनाथ का प्राचीन मंदिर है। ये 12वीं सदी में बना है।
- लोहे के दरवाज़े (ग्रिल गेट) में मन्नत मांगते हुए रंगीन कपड़े या धागे को बांधने की परंपरा बन गई है।
- कुछ लोग तो प्लास्टिक की पन्नियों को ही बांध जाते हैं। मंदिर के पट साल में एक बार महाशिवरात्रि पर्व पर खुलते हैं।
- इस कारण शहरवासियों के साथ ही आसपास क्षेत्र के लोग बड़ी संख्या में यहां पर दर्शनों और पूजा अर्चना के लिए उमड़ते है।
- यहां पर हर साल शिवरात्रि पर मेला लगता है। इस मेले में कई सामाजिक संगठनों द्वारा शिव भक्तों के लिए फलाहार, पानी और अन्य व्यवस्थाएं जुटाई जाती है।
संयोग इस बार महाशिवरात्रि पर्व को खास बना रहे
- इस बार महाशिवरात्रि पर्व सोमवार को मनाया जाएगा। सोमवार का दिन शिवजी का माना जाता है।
- इस दिन धनिष्ठा नक्षत्र का भी योग बन रहा है। ध्वज योग और विजय योग भी इस दिन है।
- यह सभी संयोग इस बार महाशिवरात्रि पर्व को खास बना रहे है।
- इन संयोगों के साथ होने से महाशिवरात्रि पर्व का महत्व बढ़ गया है।

भूतों ने एक रात में बनाया था मंदिर

महाशिवरात्रि के मौके पर शिवालयों में रात-रात भर विशेष पूजा अनुष्ठान किए जाते हैं। देशभर में शिवजी के कई अद्भुत मंदिर हैं। हर मंदिर के निर्माण की अपनी कहानी है। ऐसा ही एक मंदिर है ककनमठ, जो एमपी के ग्वालियर जिले में है। लोगों की मान्यता है कि इसका निर्माण एक रात में भूतों ने किया था।
 - यह मंदिर एमपी के ग्वालियर शहर से करीब 60 किमी दूरी पर है।
- मंदिर को लेकर एक किंवदंती है कि इसे भूतों ने एक रात में बनाया था। बनाते- बनाते सुबह हो गई और भूतों को काम अधूरा छोड़कर जाना पड़ा।
- आज भी इस मंदिर को देखने यही लगता है जैसे इसका निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया हो।
- हालांकि, भूतों जुड़ी कथा को लेकर कोई दावा नहीं किया जा सकता, पर मंदिर करीब 1000 साल पुराना है।
- कई तो प्रमाणिक रूप से यह भी कहते हैं कि इसका निर्माण कछवाहा राजवंश के राजा कीर्तिराज के कार्यकाल के दौरान हुआ था।



पत्नी की इच्छा पूरी करने बना मंदिर
- कहते हैं कि कीर्तिराज ने रानी ककनवती की इच्छा को पूरा करने के लिए 11वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण कराया गया था।
- ककनमठ मंदिर के निर्माण में कहीं भी चूने-गारे का उपयोग नहीं किया गया।
- मंदिर की ऊंचाई 115 फीट है। मंदिर के गर्भ गृह में विशाल एवं अद्भुत शिवलिंग स्थापित है।
- ककनमठ मंदिर उत्तर भारतीय शैली में बना है।
 
कैसे पहुंचे
- मंदिर जाने के लिए ग्वालियर शहर से सिहोनिया गांव पहुंचना पड़ता है, ये करीब 60 किमी दूरी है।
- इस स्थान पर पहुंचने के लिए भिंड और मुरैना दोनों ही मार्ग का उपयोग कर सकते हैं।
 कब जाएं
- श्रावण मास और शिवरात्रि में यहां जाने का ज्यादा महत्व होता है।
- शिवरात्रि पर यहां दूर-दूर से भक्त आते हैं।
- बरसात के मौसम में यह इलाका बेहद ख़ूबसूरत दिखाई देता है।