सावन महीने की शनिवार से शुरुआत हो गई है। इस दौरान झारखंड के
देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम और रांची स्थित पहाड़ी मंदिर में भगवान शिव
के जलाभिषेक के लिए भक्तों की भारी भीड़ जुट गई। पूरे एक माह तक यहां
कावड़ियों की भीड़ रहेगी।
सावन के पवित्र महीने में आपको बता रहा है बाबा
बैद्यनाथ धाम के बारे में। लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी
गई हर मनोकामना पूरी होती है।
भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में झारखंड के देवघर का बैद्यनाथ धाम
अत्यंत महत्वपूर्ण है। द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक बैद्यनाथ मंदिर
स्थापत्य कला की दृष्टि से देश के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। यहां
भगवान शिव पर सावन में गंगाजल चढ़ाने का विशेष महत्व है। बैद्यनाथ
ज्योतिर्लिंग स्थित होने के कारण इस स्थान को देवघर नाम मिला है। यह
ज्योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहां पर आने वालों की सारी
मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस कारण इस लिंग को 'कामना लिंग' भी कहा जाता
हैं।
108 किलोमीटर की करते हैं पैदल यात्रा
इस मंदिर में शिवलिंग प्रतिष्ठित है। पूरे सावन के महीने में भारत के
विभिन्न हिस्सों से 70 से 80 लाख श्रद्धालु सुल्तानगंज स्थित गंगा नदी से
पवित्र जल ले कर 108 किमी के टेढ़े-मेढ़े रास्ते की पैदल यात्रा कर शिव जी
पर अर्पित करेंगे। बैद्यनाथ धाम का मंदिर ठोस पत्थरों से निर्मित है। यह
मंदिर कब बना और किसने बनवाया, यह किसी को नहीं पता। हालांकि कुछ लोग मानते
हैं कि बैद्यनाथ मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने करवाया था।
रावण की घोर तपस्या के बाद प्रसन्न हुए थे भगवान शिव
मान्यता के अनुसार, बैद्यनाथ धाम के प्रतिष्ठित होने के पीछे भी लंबी
कहानी है। कहते हैं, एक बार रावण ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को काफी
प्रसन्न कर दिया। खुश होकर शिव जी ने रावण से उसकी इच्छा पूछी तो रावण ने
कहा कि मैं अपनी लंका नगरी में आपका शिवलिंग स्थापित करना चाहता हूं। शिव
जी ने काफी सोच-विचार करने के बाद रावण की इच्छा को मानते हुए कहा कि मेरी
एक ही शर्त है-रास्ते में उसे कहीं रखना मत, वरना मैं वहीं स्थापित हो
जाऊंगा। रावण के शिवलिंग ले जाने की कोशिश से देवलोक में खलबली मच गई, तभी
भगवान विष्णु ब्राह्मण का रूप धारण कर रावण के पास पहुंचे।
रावण को अचानक लघुशंका लगी तो उसने जल्दी से ब्राह्मण को शिवलिंग सौंप दिया। मौका देखते ही ब्राह्मन रूपी भगवान विष्णु ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया और वहां से गायब हो गए। बाद में रावण ने शिवलिंग को हिलाने की बहुत कोशिश की, पर वह टस से मस न हुआ। अंत में, निराश होकर रावण को उसी स्थान पर शिवलिंग की पूजा करनी पड़ी। पश्चात्ताप से भरा रावण, प्रतिदिन शिवलिंग की पूजा गंगा जल अर्पित कर किया करता था। कहा जाता है, बैजू नामक आदिवासी ने शिवलिंग की काफी पूजा की, उसकी असीम भक्ति से उस स्थान को बैजूनाथ या बैद्यनाथ कहा जाने लगा। कुछ समय बाद इस स्थल की प्रसिद्धि बैद्यनाथ धाम के रूप में हुई।
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