सावन
में भगवान शंकर
को जल और
दूध का अभिषेक
किया जाता है,
पर यह कहें
कि भगवान शंकर
का अभिषेक सावन
और भादो में
खुद प्रकृति करती
है, तो यह
आश्चर्य की बात लगती
है, लेकिन यह
सच है। ऐसा
जयपुर के एक
प्राचीन मंदिर में सालों
से हो रहा
है, इसमें अभिषेक
के लिए पानी
कहां से आता
है, यह भी
आज तक रहस्य
बना हुआ है।
असल में इस
मंदिर का शिवलिंग सावन
और भादो माह
में पानी में
डूब जाता है।
शिवलिंग के पास ये
पानी कहां से
आता है, आज
तक कोई नहीं
जान पाया। यहां
इनके ऊपर चढ़ाए
गए दूध और
जल भी कहां
चले जाते हैं,
किसी को पता
नहीं। स्थानीय लोगों
की मान्यता है
कि सब भगवान
शिव का प्रताप
है। जयपुर के
आमेर की पहाड़ियों से
सटा है यह
शिवालय, जहां प्रकृति का
यह रंग देखने
को मिलता है।
इस मंदिर के
बारे में जानने
के बाद शिव
भक्त वहां दर्शन
के लिए लालायित हो
जाता है। आमेर
की पहाड़ियों से
सटा यह मंदिर
अपनी अनोखी कहानी
और सुंदरता के
लिए जाना जाता
है। यहां हर
भक्त पूरे मनोयोग
से अपनी अभिलाषा लिए
भगवान के शरण
में आता है।
इस मंदिर ने
ही जयपुर का
विश्वविख्यात किला आमेर को
भी नाम दिया
था। और बाद
में चलकर आमेर
राज्य की स्थापना की
गई।
इतिहासकार आनंद शर्मा ने इस मंदिर के इतिहास और इसी संरचना पर शोध किया है। वे बताते हैं कि आमेर किले का नींव रखने वाले काकल देव की एक गाय घास चर कर आती थी और दूध नहीं देती थी। काकलदेव ने अपने लोगों से कहा कि पता करो इसका दूध कौन निकाल रहा है। जब लोगों ने देखा तो अचंभित रह गए। गाय एक छोटे से गड्ढे के पास खड़े होकर पूरा दूध जमीन पर गिरा रही थी। जब काकलदेव को यह बात पता चला तो उन्होंने वहां खुदाई कराया। करीब 15 फीट की खुदाई के बाद वहां एक शिवलिंग निकला। तब काकल देव ने वहां एक मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर का नाम अंबिकेश्वर महादेव मंदिर रखा। इसी मंदिर के नाम पर किले का नाम आमेर रखा गया।
जमीन के भीतर है शिवलिंग
मंदिर का गर्भ गृह मंदिर के तल से नीचे है। उसके बाद शिवलिंग और भी नीचे है। एक बड़े से छेद के जरिए शिवलिंग का दर्शन किया जाता है। मंदिर के के गर्भ गृह में एक ओर जालीनुमा खिड़की है। कहते हैं मंदिर के बनने के बाद उसके भीतर महिलाओं को जाने की इजाजत नहीं थी। ऐसे में वे उस खिड़की से ही शिवलिंग का दर्शन करती थी। इस झरोखे से देखने पर शिवलिंग साफ दिखाई देता है। मंदिर में गर्भगृह के पीछे एक रहस्यमयी सुरंग है। आज तक कोई उसमें जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। इतिहासकार आनंद शर्मा ने एक बार हिम्मत जुटाई भी तो वे कुछ दूर आगे जाकर वापस आ गए। वो सुरंग कहां जाती है इसका रहस्य आज भी बना हुआ है। फिलहाल इस सुरंग में सांप और बिच्छुओं की भरमार है।
मंदिर के नीचे है एक गुप्त कक्ष
मंदिर के दाईं ओर एक छोटे-से कमरे से नीचे की ओर सीढ़ियां जाती है। ये सीढ़ियां गुप्त कक्ष की ओर ले जाती हैं। यहां साधक साधना किया करते थे। मंदिर से सटा लाडो सती का स्थान है। यह हिस्सा श्मशान की तरह लगता है। ऐसा माना जाता है कि यहां मंदिर बनने से पहले यह पूरा इलाका श्मशान हुआ करता था। ध्यान देने वाली बात है कि यहां नाथ संप्रदाय के एक गुरु रहते थे। नाथ संप्रदाय के साधु श्मशान में ही रहते हैं। यहां महाराजा अम्बरीश की हवेली है। कभी यह हवेली बहुत बड़ी हुआ करती थी। अब इसका एक चौथाई हिस्सा बचा है।
दीप जलाने के लिए है एक बड़ा बुर्ज मंदिर के कोने में एक बुर्ज बना हुआ है। उसमें सीढ़ियां हैं, जो अब जर्जर हो चुकी हैं। इन सीढिय़ों के सहारे जाकर बुर्ज में दीप प्रज्ज्वलित किया जाता था। अक्सर यह दी कार्तिक मास में जलाया जाता था।


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